इस बार अरविन्द केजरीवाल और ‘आम आदमी पार्टी’ वाले ठेका मज़दूरों का मुद्दा क्यों नहीं उठा रहे हैं?

इस बार अरविन्द केजरीवाल और ‘आम आदमी पार्टी’ वाले ठेका मज़दूरों का मुद्दा क्यों नहीं उठा रहे हैं?
(क्योंकि दूध का जला छाछ भी फ़ूँक-फ़ूँक कर पीता है!)

अन्तरा घोष
दिल्ली में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो गयी है। 7 फ़रवरी को एक बार फिर जनता से कहा जायेगा कि भाजपा, आप और कांग्रेस में से किसी एक को चुन ले। भाजपा नरेन्द्र मोदी की मीडिया-पोषित लहर और साम्प्रदायिक तनाव की नाव पर सवारी करते हुए सत्ता में पहुँचना चाहती है। लेकिन नरेन्द्र मोदी की सात माह पुरानी सरकार ने जिस नंगई और बेशर्मी के साथ देश की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के मालिकों का पायबोस और सिजदा किया है, उससे जनता के भी अच्छे-ख़ासे हिस्से में उसकी लोकप्रियता में भारी कमी आयी है। मोदी लहर कुछ राज्यों में भाजपा की जीत तक क़ायम रही और वह भी इसलिए कि उन राज्यों में कांग्रेस की सरकार कई कार्यकाल पूरे करके अपने शरीर पर बचा आखि़री सूत का धागा भी फेंक चुकी थी। लेकिन दिल्ली का चुनाव आते-आते साफ़ दिख रहा है कि मोदी की लहर अब नगर निगम के नाले की ‘छप-छप’ में बदल गयी है! कांग्रेस और भाजपा अम्बानियों, अदानियों, टाटाओं, ज़िन्दलों, मित्तलों की पार्टी है, ये तो जनता के सामने बार-बार उजागर हो चुका है। लेकिन पिछले दिल्ली चुनावों में ‘आम आदमी पार्टी’ के तौर पर एक नयी पार्टी का उदय हुआ। पहले ही चुनाव में 29 सीट जीतकर ‘आप’ ने सबको चौंका दिया था। इस पार्टी ने जनता के हर हिस्से को लुभाने वाला एजेण्डा पेश किया था। इसमें छोटे और बड़े पूँजीपतियों को भरोसा दिलाया गया था कि उनके लिए धन्धा लगाना और चलाना आसान बना दिया जायेगा; मज़दूरों को बोला गया था कि ठेका मज़दूरी ख़त्म कर दी जायेगी; दुकानदारों को आश्वासन दिया गया था कि उन पर से वैट कर का बोझ कम कर दिया जायेगा; और पूरे मध्यवर्ग को जनलोकपाल बनाकर भ्रष्टाचार का सर्वनाश कर डालने का सपना दिखलाया गया था। ज़ाहिर है, अगर कोई पार्टी मज़दूर वर्ग को ठेका प्रथा से मुक्ति दिलाने और पूँजीपतियों को अधिक मुनाफ़ा कमाने की छूट देने का वायदा करती है, तो वह लोगों को उल्लू बना रही है। आम आदमी पार्टी ने भी पिछले चुनावों में ज़्यादा सीट के लालच में हर किसी को एक लॉलीपॉप दे दिया था। लेकिन असली फ़ायदा तो सिर्फ़ दिल्ली के दुकानदारों, ठेकेदारों और पूँजीपतियों को दिया गया था! इसीलिए 49 दिनों में ही केजरीवाल ने दुकानदारों, ठेकेदारों आदि को सरकारी बाधाओं (लाइसेंस और इंस्पेक्टर राज) से छुटकारा देना और एक हद तक निम्न मध्यवर्ग को लुभाने वाले कुछ कार्य शुरू कर दिये थे। लेकिन मज़दूरों को केजरीवाल सरकार लगातार ठेंगा दिखलाती रही!
arvind kejriwal cartoon Shushant Supriya
Source : Shushant Supriya
पहले डीटीसी के ठेका कर्मचारियों ने केजरीवाल को याद दिलाया कि उसने ठेका प्रथा ख़त्म करने का वायदा किया था और अब जबकि वह मुख्यमन्त्री बन गया है, तो उसे ठेका प्रथा समाप्त करने का क़दम उठाना चाहिए; इसके बाद होमगार्डों ने ठेका प्रथा ख़त्म करने की माँग की; फिर दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन के ठेका मज़दूरों ने केजरीवाल के दरवाज़े पर दस्तक दी और स्थाई नौकरी की माँग की। लेकिन केजरीवाल सरकार टालती रही और मज़दूरों से मिलने तक से इंकार कर दिया। इसके बाद, दिल्ली मज़दूर यूनियन के आह्नान पर 6 फ़रवरी 2014 को हज़ारों ठेका मज़दूरों ने दिल्ली सचिवालय का घेराव किया और केजरीवाल सरकार के श्रम मन्त्री गिरीश सोनी को जवाबतलब किया। श्रम मन्त्री ने मज़दूरों को साफ़ शब्दों में बताया कि केजरीवाल सरकार ठेका मज़दूरी के उन्मूलन के लिए कुछ नहीं कर सकती क्योंकि इससे मालिकों, प्रबन्धन और ठेकेदारों को नुक़सान होगा! 6 फ़रवरी को ठेका मज़दूरों द्वारा घेरे जाने के बाद केजरीवाल को समझ में आ चुका था कि वह अपने वायदों को पूरा कर ही नहीं सकता। बिजली के बिल कम करने के लिए भी केजरीवाल ने जनता के पैसों से सब्सिडी देने की व्यवस्था की जिसे बहुत समय तक चलाया भी नहीं जा सकता था; अपने तमाम वायदों से मुकरने के कारण केजरीवाल 49 दिनों बाद जनलोकपाल बिल के मसौदे को उपराज्यपाल के पास न भेजने की ज़िद को लेकर अड़ गया और अन्त में इस्तीफ़ा देकर भाग खड़ा हुआ, हालाँकि 49 दिनों के शासन में उसने अन्य क़ानूनी संशोधनों को उपराज्यपाल के पास अनुमोदन हेतु भेजा था! ख़ैर, केजरीवाल को मज़दूरों-मेहनतकशों से वोट पाने के लिए किये गये झूठे वायदों का कँटीला ताज अपने सिर से उतार कर भागना था, सो वह भाग खड़ा हुआ।
इसके बाद, ऐसा लगता है कि योगेन्द्र यादव, प्रो. आनन्द कुमार आदि जैसे लोहियावादी या जेपीवादी समाजवादियों ने केजरीवाल को थोड़ा समझाया है! उसको बताया है कि “देखो भाई केजरू! दिल्ली में सिर्फ़ मिडिल क्लास और लोवर मिडिल क्लास वालों को चुगद बनाने से काम चल जायेगा! इसलिए इस बार मुफ्त वाई-फ़ाई-इण्टरनेट, बिजली के बिल कम करने और पानी फ़्री करने का वायदा करो! मज़दूरों को मत छेड़ो! वो सोते हुए शेर हैं, जग गये तो फिर भागना पड़ेगा!” तो मज़दूर वर्ग के इन ग़द्दारों की सलाह पर अमल करते हुए केजरीवाल ने इस बार मज़दूरों से कोई वायदा ही नहीं किया! केजरीवाल ने पूँजीवादी राजनीति का पहला सबक़ सीख लिया हैः असली वायदे मिडिल क्लास से करो! मज़दूरों से खोखले वायदे करो और वह भी ठोस शब्दों में नहीं, हवा-हवाई शब्दों में! साथ ही, केजरीवाल ने एक और सबक़ लिया है! पिछली बार उसने उछल-उछलकर गला फाड़ा था कि 50 प्रतिशत चुनावी वायदे वह दो महीने में पूरे कर देगा! डेढ़ महीने बीतने पर जब वह 5 प्रतिशत वायदे भी नहीं पूरे कर पाया तो उसे समझ में आया कि भारत की जनता भुलक्कड़ तो है, लेकिन इतनी भुलक्कड़ भी नहीं है कि चुनावी नेताओं के वायदों को दो महीने में भूल जाये! इसलिए वायदे भुलाने के लिए अगली बार थोड़ा ज़्यादा समय लेना पड़ेगा! इसीलिए केजरीवाल इस बार अपने न पूरे किये जा सकने वाले वायदों के लिए पूरे 5 साल का वक़्त माँग रहा है! हम भारतवासी तो ‘सन्तोषम् परम् सुखम्’ में भरोसा करते हैं और हममें ग़ज़ब का धैर्य होता है! और तो और हम भूलने की कला में भी माहिर हैं और ‘जाहि बिधी रखे राम, ताहि बिधी रहना’ पर विश्वास रखते हैं! ऐसे में, आम आदमी पार्टी के केजरीवाल जैसे (अभि)नेताओं के लिए बड़ी आसानी हो जाती है! लेकिन हम मज़दूरों को कभी नहीं भूलना चाहिए।
arvind kejriwal cartoonदिल्ली में करीब 50 लाख ठेका मज़दूर हैं! और उन 50 लाख ठेका मज़दूरों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा क्या है? ठेका प्रथा का उन्मूलन! यानी कि किसी भी नियमित प्रकृति के काम पर (यानी जो ज़रूरत पड़ने पर गाहे-बगाहे न होकर रोज़ नियमित तौर पर होता हो) ठेका मज़दूरों को रखने की पूरी मनाही होनी चाहिए! दिल्ली राज्य में ऐसा क़ानून पास किया जाना चाहिए जोकि इस बात को सुनिश्चित करता हो कि नियमित काम पर ठेका प्रथा समाप्त होनी चाहिए और अन्य कार्यों पर लगने वाले ठेका और कैजुअल मज़दूर को वे सारे हक़ मिलने चाहिए जोकि ‘ठेका मज़दूर क़ानून, 1971’ के तहत दर्ज़ किये गये हैं। भाजपा और कांग्रेस तो ऐसा वायदा भी नहीं करने वाली हैं, क्योंकि उन्हें तो चुनावी चन्दा ही टाटा, बिड़ला, अम्बानी, अदानी की तिजोरी से मिलता है। आम आदमी पार्टी छोटे मालिकों, ठेकेदारों और दुकानदारों से पैसे लेकर चुनाव लड़ती है और साथ ही कुछ चन्दा ये जनता से भी बटोरती है। इसीलिए कम-से-कम उसने ठेका मज़दूरों से ‘पलभर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही’ के तर्ज़ पर झूठा वायदा कर दिया कि ठेका प्रथा ख़त्म कर देंगे! लेकिन यह झूठा वायदा भी उस पर भारी पड़ गया! और यही कारण है कि टटपुँजिया वर्ग का मफ़लरधारी, खाँसी-पीड़ित सेनापति केजरीवाल इस बार मज़दूरों से कोई झूठा वायदा भी नहीं कर रहा है!
हम मज़दूरों को न सिर्फ़ कांग्रेस और भाजपा जैसे पूँजीपतियों के टुकड़खोरों को पहचानना चाहिए बल्कि केजरीवाल जैसे झूठों-पाखण्डियों को भी पहचानना चाहिए जिनका जन्म एनजीओ राजनीति और बदबूदार लोहियावादियों के हमबिस्तर होने से हुआ है। बल्कि कहना चाहिए कि इन राजनीतिक वर्णसंकरों से मज़दूर वर्ग को सबसे ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है क्योंकि जब टटपुँजिया छोटे मँझोले वर्ग को पता चलता है कि केजरीवाल ने तो उसे टोपी पहना दी है, तो वह गुस्से में मोदी जैसे तानाशाह के समर्थन में जाता है। भारत में पिछले लोकसभा में मोदी के नेतृत्व में हिटलरों की जारज हिन्दुस्तानी सन्तानों को जो विजय मिली उसमें एक भूमिका आम आदमी पार्टी, अण्णा हज़ारे जैसे जोकरों की भी थी, जिनकी भँड़ैती में टटपुँजिया जनता कुछ समय के लिए उलझ गयी थी और जब उससे निकली तो बड़े गुस्से में थी! वास्तव में, ‘आप’ की राजनीति अपनी असफलता और उससे पैदा होने वाले मोहभंग के ज़रिये मोदी जैसे साम्प्रदायिक फासीवादियों का ही समर्थन करती है! यही कारण है कि आम आदमी पार्टी को पिछले विधानसभा चुनावों में वोट करने वाले अधिकांश लोगों ने संसद चुनावों में मोदी को वोट दिया था। हम मज़दूरों को अपनी वर्ग दृष्टि साफ़ रखनी चाहिए और समझ लेना चाहिए कि केजरीवाल ने हमसे एक बार धोखा किया है और बार-बार धोखा करेगा जबकि भाजपा और कांग्रेस खुले तौर पर हमें ठगते आये हैं! इनके हत्थे चढ़ने की ग़लती करने की बजाय हमें अपना रास्ता ख़ुद बनाना चाहिए। केजरीवाल की राजनीति वह सड़ाँध मारती नाली है जो अन्त में मोदी नामक बड़े गन्दे नाले में जाकर मिलती है!

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2015

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