इस बार अरविन्द केजरीवाल और ‘आम आदमी पार्टी’ वाले ठेका मज़दूरों का मुद्दा क्यों नहीं उठा रहे हैं? (क्योंकि दूध का जला छाछ भी फ़ूँक-फ़ूँक कर पीता है!) अन्तरा घोष दिल्ली में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो गयी है। 7 फ़रवरी को एक बार फिर जनता से कहा जायेगा कि भाजपा, आप और कांग्रेस में से किसी एक को चुन ले। भाजपा नरेन्द्र मोदी की मीडिया-पोषित लहर और साम्प्रदायिक तनाव की नाव पर सवारी करते हुए सत्ता में पहुँचना चाहती है। लेकिन नरेन्द्र मोदी की सात माह पुरानी सरकार ने जिस नंगई और बेशर्मी के साथ देश की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के मालिकों का पायबोस और सिजदा किया है, उससे जनता के भी अच्छे-ख़ासे हिस्से में उसकी लोकप्रियता में भारी कमी आयी है। मोदी लहर कुछ राज्यों में भाजपा की जीत तक क़ायम रही और वह भी इसलिए कि उन राज्यों में कांग्रेस की सरकार कई कार्यकाल पूरे करके अपने शरीर पर बचा आखि़री सूत का धागा भी फेंक चुकी थी। लेकिन दिल्ली का चुनाव आते-आते साफ़ दिख रहा है कि मोदी की लहर अब नगर निगम के नाले की ‘छप-छप’ में बदल गयी है! कांग्रेस और भाजपा अम्बानियों, अदानियों, टाटाओं, ज़िन्दलों, मित्तलों क...